अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव अब डोनाल्ड ट्रंप के लिए घरेलू राजनीतिक संकट बनता जा रहा है। करीब तीन हफ्ते पहले ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का आदेश देने वाले ट्रंप अब अपने ही देश में आलोचना और सवालों के घेरे में हैं।
बताया जा रहा है कि ट्रंप का मकसद ईरान में सत्ता परिवर्तन कर अपनी पसंद की सरकार स्थापित करना था, लेकिन हालात इसके उलट हो गए हैं। तेहरान में बदलाव की कोशिश करने वाले ट्रंप को अब वॉशिंगटन में विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
इस विवाद के बीच ट्रंप प्रशासन के पूर्व आतंकवाद-रोधी अधिकारी जो केंट ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देते हुए कहा कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के करीब नहीं था, जबकि इसी आधार पर जंग की शुरुआत की गई।
एक इंटरव्यू में केंट ने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम में इज़रायल की भूमिका भी अहम रही। उनके मुताबिक, इज़रायल ने हालात को इस दिशा में बढ़ाया, जिससे संघर्ष तेज हुआ और अमेरिका को प्रतिक्रिया देनी पड़ी। उन्होंने यह भी दावा किया कि इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार को भरोसा था कि अमेरिका उनका साथ देगा।
केंट ने आगे कहा कि न तो तीन हफ्ते पहले और न ही जून 2025 में ईरान परमाणु बम बनाने की स्थिति में था। उन्होंने यह भी बताया कि 2004 से ईरान में एक धार्मिक आदेश (फतवा) लागू है, जो परमाणु हथियारों के विकास पर रोक लगाता है, और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास इसका उल्लंघन होने का कोई ठोस सबूत नहीं था।
इस बीच तुलसी गबार्ड के बयान ने भी ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी हमलों से ईरान की सैन्य ताकत कमजोर जरूर हुई है, लेकिन वहां की सरकार अब भी बरकरार है और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बनी हुई है।
सीनेट की इंटेलिजेंस कमेटी में गबार्ड ने बताया कि ईरान की पारंपरिक सैन्य क्षमता काफी हद तक कम हो गई है, लेकिन वह समय के साथ अपनी ताकत फिर से खड़ी कर सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मौजूदा शासन कायम रहता है, तो वह अपनी मिसाइल और ड्रोन क्षमता को फिर से विकसित कर सकता है।
वहीं जॉन रैटक्लिफ ने भी कहा कि ईरान लंबे समय से अमेरिका के लिए खतरा रहा है और वर्तमान हालात में यह खतरा और गंभीर हो गया है।
हालांकि ट्रंप ने इस कार्रवाई को “आसन्न खतरे” से निपटने के लिए जरूरी बताया था, लेकिन गबार्ड ने इस पर स्पष्ट समर्थन नहीं दिया। उन्होंने कहा कि यह तय करना राष्ट्रपति का अधिकार है कि खतरा कितना तात्कालिक है, जबकि खुफिया एजेंसियों का काम केवल जानकारी उपलब्ध कराना है।
इन बयानों के बाद अमेरिका में यह बहस तेज हो गई है कि क्या ईरान पर हमला ठोस खुफिया आधार पर किया गया था या यह एक राजनीतिक निर्णय था, जिसके असर अब ट्रंप को अपने ही देश में झेलने पड़ रहे हैं।